Tuesday, October 4, 2011

जगजीत सिंह

 एक दिया भी जलता रखना कितना मुश्किल है..
 अपनी आग को जिंदा रखना कितना मिश्किल है
    ग़ज़ल और जगजीत सिंह समझ में   जवानी आते ही आने लगे थे ..... बिलकुल  पहले प्यार की तरह 
मेरी शख्शियत से लिपट गए और मैं उनकी आवाज़ का इस  तरह कायल होता गया
जैसे किसी और सिंगर  को सुनना काफ़िर होने जैसा हो .....

मुझे ये रोग .... देने वाला मेरा अज़ीज़ दोस्त रहा विशाल वाधवा 
उस से दोस्ती टूट गयी पता नहीं क्यूँ ...........'''''''..मेरे  ,अंशुल दीवान और विशाल वाधवा के साथ ही जगजीत सिंह कब हमारी तिकड़ी मैं शामिल होगये पता ही नहीं चला वो बेहतरीन तीन साल जब हम तीनों नें पूरे कॉलेज में किसी भी लड़के लड़की को घास नहीं डाली और तय  था की कोई भी साला या साली
 इसमें घुसने की कोशिश करेगा तो रायता इस तरह फैलादिया जाये की वो  समेटने में ही सिमट जाये  
.........सोनम धारीवाल नाम था उस लड़की का   मिस शिमला ...लम्बी  डस्की  आवाज़ में आर्मी की नजाकत पूरी तरह  थी .... मुझ को  उसने सब से पहले  अप्प्रोच किया तय शर्तों के मुताल्बिक मै उस से एहतियातन दूर था.. पर बाकी के  दो इस बात को नहीं मान सकते थे और कुछ दिनों में विशाल उसके गिरफ्त में था और हमरी अप्प्रोच से दूर ....... खैर .... 
deviation 
जगजीत सिंह को हम ने सबसे पहले   सुना आगरा महोत्सव में उनका लाइव कंसर्ट था
उसके बाद कई बार सुना ....कई बार और सुनने की तमन्ना दिल में है 

हमारी दोस्ती कब अंदर खाने से दरक गयी ....बिलकुल   पता नहीं चला 

मैं ने आगरा छोड़ दिया और लखनऊ आगया.... एक नयी यात्रा पर आगरा से साथ में मेरा  एक ही दोस्त आ सका जिसने मेरी जिंदगी  के  अगले संघर्ष के दौर मे मेरा  बहुत साथ दिया ...... जगजीत सिंह  ...
जिसे अब मैं फिर से सुनना चाहता हूँ .....

हजारों ख्वाइशें ऐसी कि हर ख्वाइश पे दम निकले .....

और 
आह को चाहिए एक उम्र असर होने तक
कौन जीता है तेरी ज़ुल्फ़ के सर होने तक .... 

कोई ठीक खबर नहीं लग पा रही है उपरवाला उन्हें लम्बी उम्र बख्शे
(दुआएं लीलावती हॉस्पिटल तक )
आमीन

सुमति



Monday, October 3, 2011

मैं इस दिल से परेशां हूँ ..

यूँ कर वो मचलता है ..कि

दुनियां बाप का घर हो .

बहुत बेशर्म सी मांगें

//// कुलांचें भर के चलती हैं

हमेशा एक न एक जिद

उसकी ज़द में पलती है

हमेशा  हसरतें पैबंद की

<<<<>>>><<>>......;मानिंद चस्पा हैं

निकल पड़ता है वो आज़ाद सय्यारों की संगत में   

छुड़ा लेता है अक्क्सर हाँथ  हसरतों की सोहबत में 

मैं अपने दिल की कहता हूँ ...मैं इस दिल से परेशां हूँ

परेशां हूँ बहुत मानो.......

तुम आकर इस को ले जाओ

मुझे दे जाओ अपना दिल ... जो   चलता कर सकूँ खुद को   

सुमति



Tuesday, September 20, 2011

किसी कोशिश में   लम्हें जी रहा हूँ
न जाने किस तरह मैं मर रहा हूँ

  

Thursday, September 15, 2011

बूढ़ा जाट


 
दरिया,दरिया घाट समुन्दर


ताके किसकी बाट समुन्दर .


बादल भेजें नदियाँ डालें


ऐसे किसके ठाट समुन्दर .


औघड़ दानी प्यासा पानी


पहने ओढ़े टाट समुन्दर .

दिल का सच्चा जिद्दी बच्चा  

बारह  दूनी आठ  समुन्दर    .

चप्पा चप्पा कब्ज़ा मांगे


जैसे बूढ़ा जाट समुन्दर .




सुमति

Monday, August 15, 2011

एक कप चाय और दिल्ली का रास्ता

एक कप चाय और दिल्ली का रास्ता ...........
                                                            . ..........
 इस ब्लॉग का टाइटिल अपने आप मे एक पूरा ब्लॉग है par
आप के पढने को नहीं ...मेरे याद रखने को.



खैर मैं ये मानता हूँ कि जीवन में बहुत कुछ भूल ने के लिए घटता है .


ये अलग बात है कि वो ही सब से ज्यादा याद रहता है.






"बहुत खुद्दार होकर जिंदगी मैं..


जी नहीं पाया


........


मगर हर पल मुसलसल जानता ....ये था


मेरे माने बहुत कम है ,
मेरी हस्ती बहुत कम है,


मगर तुम ने जता कर और भी
....अच्छा किया मुझ पर "




सुमति

Monday, May 30, 2011

Please वापस आजाओ

Please  वापस आजाओ

       २० साल उम्र का सांवला सा लड़का सुलगते हुए कंडे को पयार के बण्डल के बीच रख कर चारों ओर चक्कर लगा रहा  था हल्की सी हवा लगी और पयार सुलग उठी.... उसने घूम-घूम कर टीन शेड के नीचे चबूतरे पे रखी लकड़ियों में चारों ओर से आग लगा दी और आग लगाते -लगाते वह ज़मीन पर गिर गया उसक मुंह से चिंघाड़ निकली जो  कलेजे को चीरती चली गयी ...इन लकड़ियों के ढेर के नीचे उसके २५ साल के भाई का शरीर था ... जिसे छू-छू कर वो   २० साल का हुआ था .आज वो शरीर जल कर राख होने वाला था .......


......क्या होता है मर जाना .....और क्या होता है हमेशा हमेशा  के लिए जाना.......

......

              एक टीन के डब्बे में भाई ने कंचे भर रखे हैं ओर वो डब्बा अम्मा की अचार वाली टांड पर रखा करता है मेरी पहुँच से बहुत दूर मुझे रह रह कर भाई पर गुस्सा आरहा है ..वो जानता है की मर्तबान न टूट जाएँ एस डर से मैं  कंचे के डब्बे को उतारने की कोशिश भी नहीं करूँगा ...और भी बहुत कुछ मैं झेलता हूँ ....कंचे ही नहीं शतरंज ,पतंगे दोस्त साईकिल, अलग  बिस्तर, छोटा जेब वाला  कंघा ,फुल पेंट  जेब खर्च सब उसको मिला हुआ है ....मुझे क्या ....मुझे लोग उसकी पूंछ या उसके कुछ दोस्त तो मुझे "लटक" कह कर बुलाते है मैं अब सब समझ ने लगा हूँ ..........भाई की पुरानी शर्ट को ये कहकर मुझे पहना दिया जाता है की .."ये तो बिलकुल नयी रखी  है उसने(भाई ने ) पहनी ही कहाँ है"..... पर   मैं सब समझता हूँ ...... मेरा बस नहीं चलता  वरना.........पूरे पूरे दिन मुझसे   पद्दिंग कराता है बैट  तो छोडो गेंद को हाँथ नहीं लगाने देता... छोटा न हुआ गुनाह हुआ ....
                        शाम.... सूरज बिलकुल लाल  बौल
  जैसा  है  मैं और भाई छत पर बैठे हैं   ..."तू जानता है छोटे की ये सूरज डूबने वाला है ..अब हमें ये सूरज कभी नहीं दिखाई देगा"     ..."भाई ये बिलकुल बेकार की बात है भूगोल वाले मास्साब एक दिन समझा रहे थे की सूरज कहीं नहीं जाता हमारी पृथ्वी अपनी धुरी पर घुर्दन करती है जिस से दिन और रात होते हैं ठीक २४ घंटे बाद ये सूरज यहीं पर इसी शक्ल  में होगा और हम एक चक्कर काट कर यहीं आजायेंगे ...भाई ने जैसे कुछ सुना ही नहीं मेरे  सारे  ज्ञान को नज़रन्दाज कर वेह बोलता है कि .....  "छोटे पर कल जब हम आयेंगे तो ये सूरज ना होगा .....वो सूरज और होगा ....मेरी समझ में  सिवाय  इसके कुछ नहीं आया की भाई अपने आगे मेरी चलने कहाँ देता है ......शायाद इस बीच मां आँगन में खड़ी हम दोनों को आवाज लगा रही थी .."..सूरज के बच्चों नीचे उतर आओ तुम्हारा बस चले तो तुम लोग २४ घंटे पतंग उड़ाते रहो ..."...भाई ने पतंग और चरखी उठाई और नीचे को दौड़ पड़ा ...मैं सोचता हूँ कि भाई को ये भी भरोसा नहीं की मैं पतंग - चरकी ठीक से  नीचे भी  लेजा सकता हूँ ?....
      भाई को पीठ दर्द कि शिकायत रहती है ...वो खुद से तरह तरह कि दवाईयां खाता रहता है ...डॉक्टर ने कोई रीढ़ कि हड्डी होती है उसका ऑपरेशन बता रखा है ...तब से पिता जी कुछ पस्त से रहते हैं ...पिता जी दिन भर काम /ड्यूटी पर रहते हैं घर के सारे काम उनके जिम्मे हैं या अब मुझे लगने लगा है कि वो सारे काम जबरन उन्होंने अपने हाँथ में ले रखे हैं सब्ब्जी लेने से लेकर साबुन तेल दाल गेहूं सभी कुछ हमारे ब्रुश UNDERWEAR   कॉपी किताब सभी कुछ  अभी तक पिता जी ही ले कर आते हैं ......और फिर घंटों हिसाब लगाते हैं ...मैं सुनता था कि वे बेहद मेहनती   और इमानदार व्यक्ति हैं ...पूरी लगन और शिद्दत से सेठ का काम करते हैं ..सेठ भी उन्हें पूरी  इज्ज़त और थोड़ी कम  पगार दिया करता है ... पर पिता जी को इस से कोई शिकायत नहीं है ...हाँ मां ही जब तब भड़क उठती है   कि सेठ तुम्हारा खून पिए है सुबह ७ बजे निकलते हो रात ८ बजे घर में घुसते हो और अब घर पर भी लिखा - पढ़ी का काम ले कर आगये 

                 भाई की पिता जी से बेहद कम बात होती है मां सन्देश वाहक का काम करती है .."इसे पूछो इसकी  पीठ का दर्द कैसा है ....भाई सारे जवाब मां कि तरफ मुंह करके ही देता है और जब कभी पिता जी से नज़र मिल भी जाती है तो दो बोलचाल बंद लोगों जैसा उसका चेहरा हो जाता है .."इस से कहो की ज्यादा  पेन किलर ना खाया करे" ......इस मुद्दे पर ....सब शांत हो जाते हैं ....मानो किसी पर इस दर्द का पार नहीं है पिता जी पे भी नहीं ...........वो मुझ से भी काम ही बात करता है पर वो मुझे बेहद प्यार करता है अक्क्सर रात में सोते पे मैंने महसूस किया है कि वो मुझे टकटकी लगा कर देखता रहता है मेरे गालों पर भी हाँथ फेरता है कई अपने से बड़े लड़कों से उसने मेरे लिए लडाईया लड़ी हैं ..मेरी वजह से उन्हें पीटा भी है और पिटा भी   वो मुझे अक्क्सर बैठ कर ऐसी बातें समझाता है जिनका मतलब मैं बेहद देर में कुछ कुछ गलत सलत समझ पाता हूँ  हाँ उस वक़्त इतना जरुर समझ पाता हूँ की भाई मुझे बेहद प्यार करता है ....

 ..........   आज मैंने आग की लपटों में एक सूरज को दरकते हुए देखा है............ ये सूरज.....फिर वापस नहीं आये गा .....महज तीन दिन में कोई कैसे मर सकता है  ......कोई कैसे मेरे २० साल छीन सकता है .....सांसों के रुक जाने से सब कुछ क्यूँ ख़तम होजाता है...कोई अपने को कैसे आग दे सकता है  ...
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/
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.........वही सूरज लौट कर क्यूँ नहीं आ सकता

भाई इतनी बड़ी ज़िम्मेदारी .....वापस आ जाओ ...भाई तुम PLEASE  वापस आ जाओ ....में तुम्हारे कंचे .चरखी नहीं संभाल सकता ..तो फिर भला इन सब को कैसे संभालूँगा .....

भाई PLEASE ........







                                       

Wednesday, May 25, 2011

आदम क़द

5 फुट ४ इंच kad
लगभग ७५ साल उम्र
साफ़ भक्क गोरा रंग
सफ़ेद छोटी सी फ्रंच कट या मौलवी कट दाढ़ी
पतला दुबला शारीर
एक हाँथ मैं अटेची दुसरे हाँथ मैं times of india अखबार
ऐसा ही कोई शख्श धोड़ी बहुत देर मैं आने वाला होगा
मैं उस के इंतजार मैं हूँ

सुबह के ९ बज कर ५० मिनट हुए हैं मैं सोचता हूँ लगभग १० मिनट और...आने ही वाले होंगे

मैं टीन के बोर्ड पर उसका नाम एक बार फिर पढने कि कोशिश करता हूँ ... यूँ तो नाम हिंदी मैं ही लिखा है पर टीन के बोर्ड पर जंग इस कदर हावी है कि जंग के लाल लाल छींटों के बीच बा- मुश्किल कुछ पढने मैं आ रहा है ......
मो० मुस्तफा कमाल ,
एडवोकेट /नोटरी वकील

मुझे इस नाम को पढ़ कर उस कमाल पाशा कि याद आ रही है जो तुर्की मैं

यंग तुर्की मूवमेंट का नेता हुआ करता था वही छोटा क़द और हौसला इतना कि
तुर्की की सदारत छोड़ दी और अपने फार्म हाउस के ट्रक्टर पर जा बैठा
ऐसा ही कुछ लगता है इस ७५ साल के शक्श को देख कर जिस की दो बीवी और ६ बच्चे हैं ४ लड़के
२ लडकियां सभी अछे खाते पीते hain सभी की शादी हो चुकी है छोटी बेगम की फिजूलखर्ची और बड़ी की बिमारियों से तंग ये पांच टाइम का नमाज़ी जीव पता नहीं सालों नोटरी कर रहा hai और क्या हासिल कर पता है इस times of india से जो उसकी बगल मैं रोज़ पसीजने के बाद मेज पर रख कर सुखाया जाता है उसका कोट भी बहुत ... क्या कहूँ बस लबादा ही जानो ....कोट कहना मुनासिब नहीं लगता



par us ke चेहरे पर नूर इस कदर हावी है की मुझे कोई भरम नहीं की गर वो चाहें तो उनकी एक और बीबी होसकती है ....पर
मेरा शक कहें या दस्तूर की इस उम्र मैं कलमा पड़ने और mala फेरने की जगह ढंड गर्मी बरसात हर मौसम
में काम क्यूँ करते हैं
मुफलिसी का पुतला बने मुस्तफा साहब धीमी और सुस्त चाल से ही सही पर ठीक १० बजे अपनी लघबघ २०-३० साल पुरानी मेज कुर्सी
पर आ जाते हैं .... पता नहीं कौन सी मज़बूरी काम करा रही है ....
....लो वो आगये ..... मैं ने आदाब किया जवाब में पता नहीं आदाब कहा या नमस्कार
....कोट के नीचे से बेल्ट में लटकी चाबीयों के गुछे में से एक से उन्होंने




ताला पड़ी रात भर चेन से बंधी मेज और कुर्सी को जिस्मानी तौर पे अलग किया .....मेज की दराज से एक पुराना मेजपोश निकाल कर बिछाया ..अटैची मे से कुछ सामन निकाल कर मेज पर सजाने लगे
एक लाल इंक पैड ...एक नीला इंक पैड ....दो गोल मोहर ..एक चोकोर मोहर कई मोहरों के हत्ते टूटे ...(shayad ye इंतजार की क्या करेंगे नयी बनवाके उपरवाल पता नहीं कब सम्मन भेजदे )
..आलपिन का डब्बा
दोमुहाँ कलम एक ओर लाल दूसरी ओर नीला...पुराना घिसा हुआ कार्बन पेपर
एक खूंसट सा क्लिप बोर्ड ...और कवर चढ़ा रजिस्टर
जून का महिना बगल मैं दबे दबे अखबार गीला हो चुका था मुझे गीला अख़बार पकडाते हुए ...
.क्या आप इसे सामने typiest की मेज पर सूखने के लिए बिछा देंगे ....
.......मैं हकबका के हाँ ..हाँ जरुर
मेरी दोनों बीवियों में कल रात से कई बातों को लेकर झगडा होरहा है . झगडा इतना उलझ गया कि पता नहीं पहला मुद्दा क्या था झगडे का
.......... छोटी बीबी की लड़की को कार खरीदनी है और बड़ी बीबी को हार
उसे एक हार दिलाने का मेरा भी बहुत दिनों से मन कर रहा था .... कीमोथेरेपी के बाद बड़ी कमजोर होगई है मैं चाहता हूँ कि बेचारी मरने से पहले वो सोने का
हार पहनने की हसरत पूरी करले
गर्मी में भी कांपते हुए हांथों से पन्नो पर मुहर लगते मुस्तफा साहब को देख कर ग़ालिब का एक शेर बरबस याद आगया कि

कैद -ऐ- हयात , बंद-ऐ-गम असल में दोनों एक हैं
मौत से पहले आदमी गम से निज़ात पाए क्यूँ

......तो क्या सोचा आपने....
.....कुछ खास नहीं.... सोचता हूँ कि जिंदा रहने के लिए अपनी मौत तक दोनों को ही टाल देना बेहतर है
में ने तीस रुपये दिए उन्होंने छोटी सी डिब्बी से निकाल कर मुझे कुछ रेजगारी वापस कि मैं उसे बिना गिने जेब में डाल खुदा हाफिज़ कर वापस आगया .
ज़ेहन में बस बार बार ye ही लाइने घूम रहीं थीं ......

ग़ालिब ऐ खस्ता के वगैर कौन से काम बंद हैं
कीजिये हाय हाय क्यूँ रोइए ज़ार ज़ार क्यूँ

दिल ही तो है न संग-ओ-किश्त
दर्द से भर न आये क्यूँ ...........

मौत से पहले आदमी गम से निज़ात पाए क्यूँ


वो चाहें मुस्तफा कमाल पाशा हो या एडवोकेट / नोटरी
मो. कमाल मुस्तफा .... हर कद आदम कद है

सुमति














मुझे दे दो




रसीले होंठ , ..मासुमाना पेशानी ,... हसीं आँखें

कि मैं एक बार फिर रंगीनियों में गर्क हो जाऊं

मेरी हस्ती को तेरी एक नज़र आगोश में ले ले

हमेशा के लिए इस दाम* में महफूज़ हो जाऊँ (* जाल )

गुज़श्ता हसरतों के दाग मेरे दिल से धूल जाएँ

मैं आने वाले गम कि फिक्र से आज़ाद हो जाऊँ

मुझे दे दो ....रसीले होंठ , हंसी आँखें ... वो मसुमाना पेशानी ......


पता नहीं कहाँ पढ़ी सुनी ये ख्यालगोयी.... सो कर उठा तो जेहन मैं तैर रही थी

आप ही के लिए लिख मारी ...गुज़ारिश है कि फिर से पढ़ लें ...मुझे दे दो ...

sumati


Thursday, May 19, 2011

भिखारी

२५ जनवरी से वक़्त कुछ ज्यादा अच्छा गुजरा ...शायद तभी तेरा रुख नहीं किया ..वरना ऐ दोस्त तुझसा
मुझे बर्दाश्त करेने वाला इस दुनियां में कौन hai....
( हाँ एक आइना भी hai वहां भी मे बिना किसी मुखालफत के
जा खड़ा होता हूँ .)
.......और तुम्हारे पास भी अजल के बाद भी सकूँ होगा और में बेधड़क आ सकूँ गा ...


पिछली बार बात रेलवे क्रोस्सिंग के उस सुल्फा पीनेवाले भिखारी की करते करते में खुद पता नहीं किस नशे में बहक गया
की मुसलसल ५ महीने के बाद तुम्हारे पास वापस लौटा हूँ .....
सन २००५ से २०१० तक ...तक़रीबन पांच साल ... हम (मैं और वो भिखारी ) एक नफरत और मसल्हक के रिश्ते में सफ़र करते रहे .
वो रोज हाँथ फैलाता रहा और मै रोज नज़र फेरता रहा
उस दिन मुझे अच्छी तरह याद hai इतवार का दिन में अपने रोटीन में शाम से पहले घर वापस आरहा था और गुलाम अली साहब बड़ी फुर्सत से
ग़ज़ल गा रहे थे .....कूंचे को तेरे छोड़ कर
..जोगी ही बनजाते मगर ...
जंगल तेरा बस्ती तेरी दरिया तेरा सेहरा तेरा .
..कल चौदवीं की रात थी ..
गाड़ी ने या ...ठीक कहूँ तो ड्राइवर ने ब्रेक लिया . अनुमान से मैंने आँख खोली. शायद रेलवे फाटक आ गया .... और आँख खुलते ही फाटक से पहले या यूँ कहो की फाटक और हमारे बीच
वो भिखारी उसी तरह लाठी की मुठ पर सारे जिस्म का बोझ लिए ...आँखों में हलकी काजल की लकीर और चेहरे की झुर्रियौं में रात के बहे हुए काजल की
फंसी हुई परतें .... पीले.... कुछ टूटे.. कुछ उखड़े हुए दांतों की झलक भद्दे से पपड़ी जमे ओंठों के बीच से कोई आवाज सी फूटी ...कार के बंद शीशे ..
टी शर्ट के ऊपर शर्ट और नीचे वही traditional चौखाने वाली लुंगी ...जेब से झांकता बीडी का बण्डल जो शायद कहरहा hai की सुल्फा के साथ में भी इन पीले दांतों का
जिम्मेदार हूँ कमर पर बधी लुंगी की अंटी से झलकती वो क्रोशिया की बुनी हुई टोपी जो शायद मुस्लिम जमात से जकात वसूल लेने का
उपर वाले का दिया लाइसेंस hai जिसे तभी लगाना hai जब कोई गाड़ी ७८६ या KGN (ख्वाजा गरीब नवाज ) लिखी हुई आये
ठोड़ी के इर्द गिर्द इक्का दुक्का काले सफ़ेद बाल . मैं ने अपनी ओर बढा हुआ हाँथ देखा ..लोगों ने फटी हुई एड़ियाँ देखि होंगी
मैं ने उस भिकारी की दरार पड़ी फटी हुई उँगलियाँ और हथेली देखी
गंदे नाख़ून और उनसे बहार झांकता हुआ मैल... पर कुछ खास सा था की उस दिन मेरी ऊँगली प्रेस बटन पर पड़ी शीशा नीचे हुआ और
मैं ने जेब से निकल कर ५० का नोट उस भिखारी की तरफ बढाया भिकारी के चेहरे के भाव बिलकुल नहीं बदले
उसने ५० पैसे के सिक्के की तरह ही उस ५० रूपे के नोट को माथे से लगाया और सिर झुका कर लाठी टेकता आगे बढ़ गया ...
मैं ने पलट कर देखा तो वो सर पर टोपी लगाता हुआ उस ट्रक की तरफ बढ़ता जारहा था जिस पर लिखा था ख्वाजा की दीवानी .......आज उस दिन से मैं लग भग रोज वहां से गुजरता हूँ पर मेरे ५ साल पुराने गुरुर को तोड़ वो अब मेरी तरफ हाँथ नहीं फैलाता मुझ को वो उन्ही बुझी हुई उतरती गुजरती नज़रों से देख भर लेता है ..वो मेरे पास से गुज़र जाता है और ... मेरी उँगलियाँ जेब तक जा कर फिर वापस आजाती हैं .


SUMATI


Tuesday, January 25, 2011

फसाद में किरदार है

तुम्हें एहसास नहीं दर्द की कश्ती के सभी सवार उतर चुके हैं और तुम्हारे पोर्ट्रेट पर ही लाइट्स हैं पर्दा अभी भी उठा हुआ है और तुम किर्दार के बहार जा कर बैठ्गाये हो वापस आओ तुम
(म्यूजिक एक तेज जेहरीली आवाज़ सा बज उठता है )
में रोज़ एक रेलवे क्रोस्सिंग से गुज़रता हूँ मुझे जान ने वाले ये भी जानते है न की वो कौन सी क्रोस्स्सिंग है , रोज़ एक दरकते हुए शख्श को लाठी की मुठ पर खुद को ढोते हुए देखता था । शायद शुल्फा या अफीम पीता हो। एक बार भी नहीं देखा । बस एक साया सा मैं महसूस करता मेरी मुह फेर लेने की कवायत और उसकी रोज़ हाँथ फ़ैलाने की रवायत कम नहीं कम से कम ४ बरस से ज्यादा वक़्त से चल रही थी ।
मुझे झुंझलाहट सी होती थी उसे देख कर भी । वो शायद ही कभी मेरी और हाँथ फ़ैलाने से रह जाता हो और हर बार मैं खुद को दूसरी तरफ कर उसे देखने मैं भी झुंझलाहट महसूस करता था मैं कार में एक कामदार आदमी वो सड़क पे बेकाम , बेकार , बर्बाद भिखारी ।
एक रोज़ शायद मुझ पर या उस पर जिंदगी मेहरबान थी ......

GALAXY

If life brings joy in the shape of ur desired fruit nothing like that but we feel things running around us and we r like a beggar passing through a sweet shop i and the people around me are definitely of the same taste,, more or less,
And i think this year also none of us could spare time to be a part of literature fest Jaipur in which from 21 jan to 25 jan Salman Rushdie, Wole Soyinka, Ian McEwan, Vikram Seth, Simantini Range Raghav, Niall Ferguson, Sheen Kaaf Nizam, Roberto Calasso, Roddy Doyle, Lawrence Wright, UR Ananthamurthy, Kiran Desai, Pico Iyer, Simon Schama, Thomas Keneally, Hanif Kureishi, Vikram Chandra, Steve Coll, Daniyal Mueenuddin, Hari Kunzru, Mohammed Hanif, Girish Karnad, Ashok Vajpeyi, Colin Thubron, Sunil Gangopadhyay, Suketu Mehta, Krishna Baldev Vaid, Andrew O’Hagan, Chitra Mudgal, K.Satchidanandan, Geoff Dyer, Amit Chaudhuri, Fatima Bhutto, Gulzar, Javed Akhtar, Michael Frayn, Stephen Frears, Alexander McCall Smith, Donna Tartt, Tina Brown, Shashi Tharoor, Mohammed Hanif, Paul Zacharia, Uday Prakash, John Berendt, Christopher Hampton, Nadeem Aslam, Prasoon Joshi among many others were present . they talked much about their own creations some of them became storyteller . it was a million doller opportunity to get narration from the writers like them . later or sooner some of them may shine together next year fest and than i will strive hard to see it atleast once in my lifetime
The Jaipur Literature Festival is an annual literary fest taking place in Jaipur since 2006.The Diggi Palace Hotel serves as the main venue of the festival. The Jaipur Literature Festival is the biggest literary festival not just in India, but in Asia, and was described by Miranda Seymour in the Mail on Sunday of the 10th August 2008 as "the grandest literary Festival of them all". It is held each year in Jaipur, Rajasthan during the month of January, usually in the Hall of Audience and gardens of the Diggi Palace in the city centre, and celebrates excellence in Rajasthani, Indian and International writing.
The festival directors are the writers Namita Gokhale and William Dalrymple and is produced by Sanjoy Roy of Teamwork Productions. The Festival is an Initiative of the Jaipur Virasat Foundation founded by Faith Singh, originally as a segment of the Jaipur Heritage International Festival in 2006, and developed into a free-standing festival of literature standing on its own feet in 2008. JVF's Community Director Vinod Joshi is its regional advisor. The Jaipur Heritage International Festival is an initiative of the Jaipur Virasat Foundation. All events at the festival are free and not ticketed
so get ready i offer you to book a tour with me for nxt time there will be HUM-TUM and stars

i feel sorry for being so far from my blog for such a long time but u know i am not far from you
sumati