Monday, September 29, 2008

बे ख़बर

जिंदगी दर्द-ऐ-लबादा है हम न समझे थे
go ya सहेज के क्यूँ रखते इस पैराहन को ।
जब भी रात की उंगलिया चाँद के सिराहने कुछ टटोलती हैं.... तो टूटे हुए तारे हाँथ से सरक कर गिर पड़ते है ये तारे ..,,,...मानो हमारे अरमान ,,,...जो कभी चलते फिरते और उम्मीद से भरे होते ...जैसे दौरे बदगुमानी में आखिरी safe का koi मुग़ल बादशाह किसी मोजज़ा का इंतजार करता था और bar- bar zillat से takrata था ..वैसे ही en armano ने भी dam toda और तारे बन गए ..... और नींद उठा कर फिर वहीं चाँद के सराहने रख देती है उन तारों को ..मैं नींद में कहाँ तक और कब तक rahun ... tiragi कब तक रहे ....चाँद की roshni में khwab की faslon के pakne का entzar कब तक करूँ ...जो khurshid mukhalif है तो मैं कहाँ जाऊँ .....
कद उसका kaba से बड़ा हो गया
जो सड़क पे unghara खड़ा हो गया ...
ये तारे तो chhup के रात के अंधेरे मैं timtimaate हैं खुल कर सामने नहीं आते ये मेरे अन्दर ander बढ़ते हैं मेरे जिस्म को phadte हैं .....और कोई बे ख़बर sota है ...

Thursday, September 11, 2008

बस यूँ ही यहाँ आकर व्यस्तता का रोना ठीक नहीं लगता । हर आदमी काम धंधे से लगा है .लेकिन हम जैसे अव्यवस्थित व्यक्ति को तो समय का रोना जिंदगी भर रोना है.बस एक काम के पीछे पड़ कर सारा समय उसी में बिता देना और बाकि काम छूट जाना हमेशा से रहा है ..और कितना भी कोसो अपने आप को लेकिन ...सुधार कहाँ...किस का नाम है... वो जो यहाँ आते हैं रोज़ एस उम्मींद में की शायद में कुछ कहूँगा वे भी बहुत व्यस्त हैं मुझ से ज्यादा महत्वपूर्ण भी लेकिन क्या है ....कल फिर वैसा ही मुझे हो जाना है शायद इसीलिए दिन रात यात्रा में रहता हूँ ...सजा है मेरी ....मेरे लापरवाह होने की ...हमेश से फैला -फैला..... बिखरा -बिखरा ..में अपनी सजा के साथ ...

बुहारता हूँ ...
हर रोज़ ..कुछ ...
शायद
जिंदगी को॥
मगर ... हताश हवाएं
बिखेर देती है ....
कायनात मेरी...

यात्री