Monday, July 19, 2010

sazayen भेज do ....

मुझे गुलज़ार साहब कि कलम से रेशम के कतरे बिखरते दिखाई देते हैं शायद post -modern era कि बात यहीं दम तोडती लगती है मुझे यकीं के साथ ये अर्ज़ करना है कि उसी प्लेटफ़ॉर्म पर वो रूहानी सी लाइने खड़ी मिलती हैं जहाँ फुल स्टॉप और कोमा के सहारे गुलज़ार साहब ग़ज़ल और नज़्म के जामे में उन्हें (लइनों को ) खड़ा कर जाते हैं कोई कैसे कह्सकता है कि पोएट्री हों नहीं सकती post modern critics को गुलज़ार समझ आयें तो शायद वे अपनी ही बात से इतिफाक न रखें । philhal गुलज़ार कि एक बेहतरीन ग़ज़ल बहुत ऊंचाई से आई है इंशा अल्लाह आप को भी पसंद आये यूँ कर ये post भेज रहा हूँ

गुलों को सुनो ज़रा तुम , सदायें भेजी हैं
गुलों के हाँथ बहुत सी , दुआएँ भेजी हैं ।

तुम्हारी खुश्क सी आँखें भली नहीं लगतीं
वो सारी चीजें जो तुमको रुलाएं भेजी हैं ।

सियाह रंग चमकती हुई किनारी है
pahin lo acchi lagengi , घटायें भेजी hain ।

tumhare khwab से har shab lipat के sote हैं
sazayen भेज do , hamne khatayen भेजी हैं ।

do lines और
meri aankhon pe tab savera हों ,
meri mutthi में jab andhera हों ।

dard, jazbat ,ashq ,tanhai
loot le aake जो lootera ho ।

sumati @ yatra



Wednesday, July 14, 2010

मेरे होने का मकसद

नज़र मैं एक ख्वाब आ के बैठ गया । सब दिखना बंद होने लगा । उम्र के साथ आपकी शक्शियत पुख्ता होने लगती है ....और जरूरतें इंसानी ।
हर उम्र का एक ख्वाब होता है
उम्र १३ .....ख्वाब सैकिल का
उम्र १६ .....पड़ोस कि लड़की
उम्र २० ......classmate girl का ख्वाब
२३...... नौकरी का
२७.... दौलत का
३२ .....तरक्की का ख्वाब ....और एक खुबसूरत मकान का ख्वाब
३५ .....अपने होने का ख्वाब .....
......ये मैं जान ता हूँ कि ये ऊपर के सब ख्वाब देख चूका हूँ ...
मेरे ख्वाब कमोवेश पूरे भी हुए हैं वो कौन सी ताक़त है जो खाव्ब पूरा करालेती है मैं नहीं जानता पर...... इतना जान ता हूँ मेरे होने के मकसद अभी तक पूरे नहीं हुए हैं ...मेरी अब इंसानी जरूरतें ....जो पूरी हो रही हैं या यूँ पकड़ो कि हो चुकी हैं
पर इंसानी मकसद .....शायद ..... यात्रा शुरू करने का ..वक़्त आ रहा है ..वो ख्वाब जो आँखों पे चिपका है ....कुछ और देखने नहीं देता ....जल्दी मिलता हूँ ....
सुमति