Tuesday, February 23, 2010

पैर

पैर इन्सान के शारीर का वो अंग जिस पर हम गौर नहीं करते ।पैरों पर झुकना ,पैर सकोड़ना , पैर फैलाना । पैरों पे गिर्जाना , पैर बचाना , पैर निकलना , पैर दिखाना , पैर पर पैर रखना और न जाने क्या क्या ....लेकिन इन पैरों की खूबसूरती पर गौर करें ...........आज जब मैं ने इस बारे में अचानक सोचना शुरू किया तो घंटों के हिसाब से बाते बिखरने लगीं हलके हलके मैंने पैर समेटना शुरू किया और वापस अपनी खोली में । मैं जिस किसी से भी मुखातिब रहा उसके पैरों पर मेरी नज़र रही । कभी पैर छुए कभी मन किया की इस शख्श के पैरों में लोटने को मिलजाए ..कभी कहीं पैर पकड़ कर बैठने का मन किय तो कहीं पैर chum lene को... तो कभी अंगूठे और उँगलियों मैं खो जाने का मन किया । मैंने कुछ खुबसूरत पैरों के छुप कर फोटो भी खींचे हैं ... bada galat laga पर क्या karun ......क्या आप भी इस में कुछ जानकारी रखते हैं तो मुझ से शेयर करियेगा । ho सकता है आपके पैर के फोटो भी मेरे पास हों ॥

Saturday, February 20, 2010

resume

पिछली पोस्ट में एक नज़्म लिखी थी पर शायद नेट की वजेह
से पूरी-पूरी ठीक उतर नहीं पाई थी .
एक बार फिर कुछ तर्तीम कर के आप के नज़र कर रहा हूँ
उम्मीद है आप मेरी request पर गौर फरमाएंगे ......


tum मुझको बस इतने से काम पे रख लो ....

की जब भी सीने मे झूलता तेरा लोकेट ...
उलट जाये ..... तो सीधा करदूं

की जब भी आवेज़ा * तेरा बालों से .. (*topes / कुंडल)
उलझ जाये.......... तो सुलझा दूँ...

की जब भी सरे राह दुपट्टा तेरा....
अटक जाये ...... तो संभाल लूँ ..


मुझ को tum बस इतने से काम पे रख लो..
दुनिया तो न जाने क्या समझती है मुझे ।


Tuesday, February 16, 2010

ek छोटा सा लम्हा है जो ख़त्म नहीं होता
मैं लाख जलाता हूँ वो भस्म नहीं होता
जिंदगी मैं कभी ऐसे मोड़ आजाते हैं की हम दूर तक उनकी टीस पाले चलते हैं ..हमारा बहुत कुछ छीन जा ता है और कुछ मिल जाता है ...एक अँधा कुआं सा है एक बंद गली सी है....खैर छोडो ..मुद्दा ये है की जल्दी अगली पोस्ट का वादा करके गया था ...और बराए मेहरबानी ...सुबह की लखनऊ की ट्रेन के जो रात भर जागना था सो पोस्ट करने बैठ्गाया ...यूँ तो कई उलाहने मेल बॉक्स तक जा पहुंचे पर क्या करें ...६ को तो आप को बताकर ही गया था की जिम कॉर्बेट जा रहा हूँ ...फिर ११ को मैनपुरी ..१६ को लखनऊ जाना है यानी आज ...१७ को बुलान्द्शेहर ..२० को गुडगाँव....यात्रा ...यात्रा बस....यात्रा ...मन कहता है की....
मुझ को इतने-से काम पे रखलो
जब भी सीने मैं झूलता लोकेट
उलट जाये ..तो सीधा करदूं ।
जब भी aaweza (kundal) uljhe baalon से
use sulajh dun मैं apne haanthon से
जो garare मैं paon phans जाये
ya atke tera dupatta kisi bala से
use sambhalu ॥
बस mujhe इतने से काम पे rakh lo ....

Thursday, February 4, 2010

दया दृष्टि

खोजती है जमी, आसमान के लिए

एक परिंदा , फलक के वीरां केलिये

ये शहर बौद्धिक नहीं माना जाता है यहाँ मध्यवर्गीय साहित्यिक लोग हैं जो तेल फुलेल लगा कर इन दिनों हर शाम I.M. A. हॉल के इर्दगिर्द दिखाई देते hain

Bareilly में जब २००७ की जनवेरी में पहली बार विजय तेंदुलकर साहब ka प्ले shakha ram book binder देखने को मिला तो एसा laga ki ये shahar भी अंगड़ाई ले रहा है है ..फिर सूरज का सातवां घोडा, घासीराम कोतवाल, और कई प्ले देखने को मिले दया दृष्टि ट्रस्ट का ये आफती शौख डॉ ब्रिजेश्वर सिंह से निकल कर पुरे ट्रस्ट पर हावी हो जाता है और जनवरी फेर्बरी में अब पूरी बरेल्लीय के sir chadh कर बोलता है मै ट्रस्ट में नहीं हूँ में तो एक दर्शक की भूमिका में प्ले देखने को डेली प्लान मैं रखता हूँ । सुबह अख़बार में पिछले दिन के प्ले के बारे में न्यूज़ पढ़कर शुरू करता हूँ और रात प्ले के गोरे काले पछ को विमर्श करते हुए ख़तम करता हूँ ...इस साल ''बाई से biscope , चेकव की दुनिया ,नमक मिर्च, ऐसा कहते हैं ,पार्क ,रूप अरूप आदि प्ले देखने को मिले अच्छा sound and light arrangment tha . makrand dshpandey yashpal sharma ,sadiya siddiqi , benjamin gilani aur ese kai chehare jine barson se t.v. per dekha hai saamne play main etne shashakt lage ki क्या कहने .....पर २००७,०८ और खास कर २००९ की तुलना मैं इस साल के प्ले दम तोड़ते नज़र आते हैं उम्मीद करते हैं की अगले साल बेहतर प्ले चुने जायेंगे .....अभी ''विजय तेंदुलकर का ''खामोश आदालत jaari है ''एक बेहतर प्ले हो सकता है ...पर उसदिन शायद मैं जिम कॉर्बेट मैं होऊं ....

कासिद kehte hain dakiye , POSTMAN ko )

kaasid ke aate aate khat ek aur lik rakhun

main jaanta hun vo jo likhenge jabav main ...

अगली पोस्ट जल्दी ही ..