yatra

Friday, February 5, 2021

अकेले हो जाओ

 तमाम मुश्किलों का एक ही हल है 

अकेले हो जाओ ,

मिलो किसी से न किसी को हाल ए दिल ही बतलाओ 

अकेले हो जाओ 

गर्दिशों में जब कभी दामन तुम्हारा फँस जाए 

जब किसी बात से दिल तुम्हारा धँस जाए 

जब रोना तुम्हें अपनी ही हर एक बात पर आए 

किसी की बेरुख़ी जब तोड़ दे दिल को तुम्हारे 

ना मालूम हो कि अब हो तुम किस के सहारे 

तुम्हें जब मितलियाँ नाम पे रिश्तों के आए 

किसी की बेरुख़ी जब कभी बेहद सताए 

अंधेरे की तुम्हें जब ज़िंदगी लगने लगे प्यारी 

दुश्मनों से जब कभी होने लगे यारी 

और किसी की दोस्ती पड़ने लगे भारी 

लगे जब ज़रूरत कहीं पर नहीं है तुम्हारी 


यक़ीन मानो यही वो पल है 

तुम्हारी मुश्किलों का एक ही हल है 

मत घबराओ ......अकेले हो जाओ 

सुमति





Saturday, August 29, 2020

तेरे बाद -


मैं तुझे छोड़ कर 

जुड़ता रहा कई नाम से 

ज़िंदगी ले चली मुझे काम से 

मिले रिश्ते कई इफ़रात में

बने ताल्लुकात भी जज़्बात में

मैंने ओहदा दिया  सभी को कुछ 

तलाशा चाहतों को उनमें बहुत ,


मगर लगने लगा है मुझको अब 

मैंने बुन लिया है  एक दाम* को   [जाल]

जिसमें धागे हैं  कई नाम को 

वो मुझे बचाए हैं कि फँसाए हैं 

दिन रात के वो जो साये हैं .

...पर 

चाहतों का जो तू सैलाब था 

तू  मुझे थामे था ,मेरा बचाव था 

मेरा दम घुट रहा है इन दिनो 

क्या सच में कोई मुझे बचाएगा 

क्या तेरे बाद भी तुझसा 

कोई मुझको चाहेगा . 

सुमति 

किनारे के दुखड़ा रो गए हैं 

तल्ख़ दरिया के तेवर हो गए हैं 


रात लहरों ने आपा क्या खोया  

निसां साहिल के सारे खो गए हैं 


जुनूँ शिद्दत दुआएँ आरज़ू आहें 

यहाँ तक आते आते सो गए हैं 


दाग यूँ तो दामन पर बहुत थे 

यार अपने लहू से धो गए हैं 


नहीं क़ाबू में मुहब्बत हमने माना 

बर्बादी खुद की ही हम बो गए हैं


वापसी उनकी तो मुमकिन नहीं है

हिरन सोने का लेने जो गए हैं 


तुम्हारा नाम ले के चल पड़े जो 

पत्थर पानी पे बहके वो गए हैं 


मिला लो मुझसे अब अपनी हस्ती 

मेरे अरमां सारे ख़ुदकुशी को गए हैं 


वो जिसका नाम लेकर जागना था 

हम उसी का नाम ले कर सो गए हैं 


सुमति 

Friday, August 7, 2020

मेरी बच्ची

मेरी बच्ची 

तेरी मुस्कराहट से 
मेरी सांसों का रिश्ता है 

ये हंसती बोलती आँखें 
मुझे जीने को कहती हैं 
तुम्हारी बात में जो बे नियाज़ी है    (बे परवाही )
वही दरकार है अब मेरे होने की 
और 
तुम्हारा होना ही मुझको बताता है 
कि 
अभी भी ये दुनियां मेरा नशेमन (आशियाना )है 
है अभी भी 
गुलशन में ताबानी  (नूर )
कि लर्ज़िश भी इसी से 
मुझ पे तारी है 

पर मैं डरने लगा हूँ ,तुम 
कभी खबरों में मत आना 
कभी  कहने पे मत जाना 
फरेबी ये जहाँ सारा 
बहुत मासूम तुम हो

मैं ये भी  जानता हूँ 
तुम्हें मुश्किल बहुत होगी 
कि 
जब रिश्ते रस्ते बदल लेंगे 
पर तुम 
किसी को हक़ देना 
की तुम्हें वो तोड़ डाले 

मेरे जो बस में होता 
मैं तुम्हें आँखों में ही रखता 

मगर मैं ये  भी जानता हूँ 
क़फ़स में  तुम को जो रक्खा 
तो खुद को
 माफ़ ही ना कर पाऊंगा मैं 

सो
 रहो आज़ाद तुम इस जहाँ में 
मगर मेहफ़ूज़ ऐसे 
कि जैसे 
कोई बाद- -सबा 
बहती है फ़िज़ा में 
जिसे महसूस तो ये दुनियाँ करले 
मगर ..छूने पाए 

सुमति 


Friday, July 17, 2020

माँ

रवायतें 

कुछ मुख़्तसर सी हिदायतें 

कुछ बेअसर सी कवयातें 

उस पे भी मेरी हाँ है 

क्यूंकि वो जो माँ है 

बड़ी अजीब है .

सुमति 

लिहाज़

लिहाज़ इतना भी मुनासिब नहीं 

कि घुटने लगे दम 

आह दब के सीने में रह जाए

अफ़सोस अपनी बेज़ुबानी पे आए तुम्हें 

और बेहयाई से कोई लूट ले जाए 

सुमति 

 

बारदरी

जेहन की बारादरी में

 उतर के देखो तो 

मिलेंगे दरीचे कई गुमसुम से ,

 हताश कोनो पर बैठे हुए 

कई बुझे अरमां 

और मिलेंगे तमाम 

शिकश्ता उम्मीद के दिये

 वीरान अंधेरों में रोते हुए 

पर मगर 

खिल उठेंगे  फूल फिर दलानो में 

महज़ तुम्हारे पैर रखते ही ..

बस एक बार उतर के देखो तो 

जेहन की बारादरी में 


सुमति