Friday, June 10, 2016

आसान सी लगती
इस दुनिया में
 कभी कभी इतनी मुश्किलें भी
 आसानी से घर कर जाती  हैं कि
 पता ही नहीं लगता।
 हंसती खेलती ज़िंदगी कब
 दर्दनाक खेल बन जाती है
हम सोच भी नहीं सकते. .
  एक छोटी सी सिंदूर की डिब्बी।
..... बा मुश्किल दस रुपये की ही तो होती है। .
........ पहुँच से कैसे दूर होजाती है.
कभी बिंदी के ढेरों पत्ते
और उन मैं अनगिनत बिन्दियो मे
 एक बिंदी अपनी पसंद की
 और कभी        बिंदी ही बंद ।  
कल जो मंदिर
 हमारी हर मुश्किल का हल
 देने का भरोसा देता था
 एक झटके में
 उस से ही भरोसा उठ जाता है।
  कैसे दसियों साल बीत जाते हैं
  पता नहीं चलता
  और क्यों एक एक दिन काटना मुहाल हो जाता है.......
..  कभी खिलखिलाती हंसी बंद होने का नाम नहीं लेती
 और क्यों अब  आँखें है कि  बही जाती हैं
तुम क्या हो.....  कैसे हो.          
   यक़ीनन  इन्सान नहीं
वो  होते तो ऐसे बुरा  हश्र  न किया होता। 
  किस ग़लतफहमी में  मैंने
 तुम्हें सब कुछ माना और
अब  जिस ओर नज़र जाती है
तुम्हारा झूठ दिखाई देता है।
 झूठ   
 सब झूठ....  झूठ....  झूठ 

Saturday, May 23, 2015

जो नाक पे है गुस्सा

खबर खराब थी ,
या पी शराब थी 
तकलीफ में थे तुम ,
या खुद में ही थे गुम
नज़र में आ गए
या धोका खा गए
नरम गरम अजब करम दिखे बहुत लगे जो कम  ,,,,,महीन सा ये ,,,,,गुस्सा
है नाक पे जो गुस्सा
जता भी न सके ,
छुपा भी न सके
तो है फिजूल गुस्सा

Wednesday, May 13, 2015

ग़ज़ल

फ़क़त इतना गुमां दिल में लिए हूँ,
तेरी महफिल में सबसे कम पिए हूँl

ब जाहिर आशिकी होती भी कैसे,
नज़र के साथ होठों  को सीये हूँl

ख्यालों ख्वाहिशों की कसमकश में
मैं रोना दोस्ती का भी लिए हूँl

ये अहसां दर्ज है हर्फ ए वफा मे,
तकादा तुम से अबतक कब किए हूँ

सुमति

Friday, April 17, 2015

मसाइल माँजते हैं

मुझे हैरत नहीं कि
वक्त मुश्किल आ गया है
मेरी शोहरत पे यूँ तो

हर किसी को रक्श आजाता
मगर एक जख्म बजाहिर हो गया है ।
कि
जिससे हर्फे तसल्ली दोस्तों को
मिल गई है।
अब इस से मुश्किल और फिर क्या वक्त होगा।
।।।।

सुनो हम पर मुहब्बत का मुकदमा चल नहीं सकता
दिवाला ओर दिवानापन  मेरी सूरत पे चस्पा हैं।

Friday, December 5, 2014

जिया

जो मेरे नसीब की हद है
जो मेरी खुशी का आखिरी मुकाम है
जो रौनक ए हयात है मेरी
जिससे  सारी कायनात है मेरी
मै उसके  नाज़ ओ नखरों ही से आबाद हूँ
मैं उसकी जिद्द ओ जिरह से ही शादाब हूँ

Monday, August 4, 2014

बावस्ता के वास्ते

 मैं एक शेर लिख ता हूँ आप पढ़िए .
."मैं ये बोला इज्ज़त ओ शोहरत है मकसद
  वो ये बोला ख्वाब में बिखराव सा है"

जिंदगी मैं एक अजब ठहराव सा है
और सोचों में वही भटकाव सा है  
 २००३ कि बात है यूँ चुटकी  से जैसे रेत फिसल जाती है फुटकर शायरी और और ग़ज़लों को सुनते सुनते एक दिन एक हरी स्याही से दुरुस्त किये यही  कोई पचास साठ पन्ने सर्किट हाउस कॉलोनी के मकान नंबर शायद ८ के बाहरवाले कमरे में मिले
 सलीका सख्त राह हो तभी सलीका है मैं नहीं मानता ....
यूँ तो मेरे मानने के कोई बहुत बड़े मायने नहीं हैं पर इंसान भी तो बड़ा आदमी नहीं है शायरों, नगमा निगारों और सियासतदा  हाकिमों कि तरह बस ..उतने ही मायने में  ये गुलदस्ता है
सख्त को जाओ तुम चलो मैं देखूं .....बड़ी खलिश है समुन्दर में  डूब जाने कि .
.यही  दुनियां  है तो फिर होने दो ...
मुझे तलाश फिर किसी और की है 
 कुरेद कर भी जेहन से मैं न जिसे  निकाल सका...
तवील रात जब मुझ से तुम बावस्ता  थीं ...
 उन्हीं पलों में    मुझे फिक्र रोज़गार की थी
..उन्हीं पलों में  मुझे सय्यारों  की गर्त  छाननी थी ...
और अब लम्हे तवील हो के मेरे सर पे सय्यारों की मानीं चस्पा है
और मै उल्काओं सा तुम से टकराने को भटका फिर रहाहूँ..
..मुझे जो चूर करदे ऐसे सख्त हादसे का इंतजार है
मैं ये किस तरह का आदमी हूँ
मैं ये किस तरह का हादसा हूँ
अल्लाह तेर नाम को ,, लेकर बारम्बार
खूब कमाई रिश्वतें ..खूब भुनाए यार

काश की कोई ज़ेहन भी चमके
जिस्म यहाँ जीशान बहुत हैं 
मै एक सदा वरक अकेला
बंधने को जुज्दान बहुत हैं
वो झोंका ताजी  हवा का है नाम हम सब ने मिल कर पवन दिया है । यकीनन ये हवा आगे कई मंजिलों तक जायेगी पर यकीन जानिए जो मरासिम बावस्ता से  है वो कोई मंजिल हासिल न कर सकेगी
बावस्ता के वास्ते 

श्री ,,,,नगर

अब कहाँ मिलता है जन्नत का नज़ारा
बहुत मुश्किल में, ज़मीं का ये सिरा  है।

ये दो लाइने   पुरे वक़्त जहन में  घूमती रहीं .  सब कुछ तयशुदा था। एयर टिकिट ,इन्नोवा टैक्सी आर्मी गेस्ट हाउस आगे होटल पहलगाम,होटल ललित ग्रांड ,शिकारा  और हमारी टैक्सी का ड्राइवर राजा,,,,,,,,,,,,,, बस जो तय  नहीं थी  वो कश्मीर की फ़िज़ा। हम महफ़ूज़  गए और महफ़ूज़  रहे पर ये ख्याल की यहाँ महफ़ूज़  बने रहने की जरुरत है बस यूँ  मानिए कि हमारे कश्मीर दौरे  में  खलल डाल रहा था। मजाक है क्या ,,,,अपने ही मुल्क में अपने ही हिस्से में एक दहशत लिए जाना      और एक कसक के साथ वापस आना … साल २०१२ की ही तो बात है

रास्ते भर मेरा मन जैसे कुछ देखने को नहीं कर रहा था बस हर पल जहन मे  कोई न कोई सवाल उठ रहा था और पूंछने को ले दे के हमारा ड्राइवर राजा ही बचता था कई सवाल ऐसे थे की पूंछ भी नहीं सका …मसलन
तुमको कभी किसी ने so called जिहाद के लिए कहा  … इसके लिए  कोई कैसे तैयार हो जाता है। … क्या पाकिस्तान गए हो …… घुसपैठिये क्या लालच दे कर तुम लोगों के बीच जगह बना लेते हैं। .... गर दो ही रस्ते हों हिंदुस्तान या पाकिस्तान तो तुम लोग  किधर जाना पसंद करोगे वो क्यूँ ?

रात हमारी आर्मी बेस में होती और दिन कश्मीरियों के बीच    दोनों जगह बिलकुल अलग सी सोच समझ  और नजरिया देखने को मिल रहा था    हम कहते हैं की दोनों ही एक मुल्क के लोग हैं जाहे फौजी हो या कश्मीरी पर जन्नत में दोनों अलग अलग पाले में  खड़े दिख रहे थे.
   जाओ सो जाओ
 और बिस्तर पर
 अपने जहन को 
सोता हुआ छोड़ कर चुपचाप चले आना
 हम तुम्हे आजादी देंगे ख्वाब  
बोने की 
(अधूरे  ) । सुमति