yatra

Tuesday, November 13, 2018

ख़ार ख़ार पैरहन

दर्द ये है कि शहर वीरान है
खूबसूरत मंज़रों का रास्ता बेजान है
हम बड़ी मुश्किल में पहुंचे हैं यहां रश्क ऐ कमर
तू कहाँ है सोचकर ये जी  बड़ा हलकान  है

 जब  गर्दिशे गुज़रीं हमारी तरबियत पर बारह 
 तब ये जाना बाप होना भी कहाँ आसान है
बिन बुलाये हम गए थे उसकी महफ़िल में गलत 
बढ़ती हुई है उम्र अपनी और वो अभी जवान है
ख़ाकसारी सूरतों पर इस तरह से दर्ज़ है कि
मुस्कराहट भी यही कहती है तू परेशान है

जान की कीमत सही मिलपाये ये मुमकिन नहीं
है दुकनदारी  बहुत , नीयत बड़ी बईमान है

वो खोज लाएंगे तुझे कि दार फिर गुलज़ार हो
ज़ख्म ऐ माझी से अभी तक यार भी  अनजान हैं
उसपर दर्द ये है कि शहर वीरान है
सुमति 


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