yatra

Thursday, July 5, 2018

साझेदार

दर्द
मुश्किल तो न था सहना। ....
पत्थरों पे बून्द के  गिरने से पहले
 आसमान का दिल  धक् से रह जाए.

जो
ठिठक के रह जाये महक
फूल  के  झरने के डर   से.

और
 छुप जाएँ रौशनी के पुर्जे
किसी दरवाज़े के पीछे
अँधेरे के डर  से।

कहीं
परों  को खोलने से पहले
परिंदा सहम  जाए शिकारी के डर  से.

जो
निकलने से पहले सफर  में
तुम ठहर  गए,
तुम
 जो गुज़र गए अलेहदा ,
मेरी
 सुबहें थम सी गयीं
थम
 सा गया वक़्त मुश्किल
झर
गयीं उम्मीदें  किसी फूल सी
अँधेरे
थम गए दामन में  आकर
सहम
 गया परिंदा दिल।


दर्द
इससे  मुश्किल तो न  था सहना
जितना मुश्किल हुआ है    
तन्हा   रहना।
काश
 तूने
सुना  न होता
गैरों का कहना

.सुमति



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