Monday, August 4, 2014

बावस्ता के वास्ते

 मैं एक शेर लिख ता हूँ आप पढ़िए .
."मैं ये बोला इज्ज़त ओ शोहरत है मकसद
  वो ये बोला ख्वाब में बिखराव सा है"

जिंदगी मैं एक अजब ठहराव सा है
और सोचों में वही भटकाव सा है  
 २००३ कि बात है यूँ चुटकी  से जैसे रेत फिसल जाती है फुटकर शायरी और और ग़ज़लों को सुनते सुनते एक दिन एक हरी स्याही से दुरुस्त किये यही  कोई पचास साठ पन्ने सर्किट हाउस कॉलोनी के मकान नंबर शायद ८ के बाहरवाले कमरे में मिले
 सलीका सख्त राह हो तभी सलीका है मैं नहीं मानता ....
यूँ तो मेरे मानने के कोई बहुत बड़े मायने नहीं हैं पर इंसान भी तो बड़ा आदमी नहीं है शायरों, नगमा निगारों और सियासतदा  हाकिमों कि तरह बस ..उतने ही मायने में  ये गुलदस्ता है
सख्त को जाओ तुम चलो मैं देखूं .....बड़ी खलिश है समुन्दर में  डूब जाने कि .
.यही  दुनियां  है तो फिर होने दो ...
मुझे तलाश फिर किसी और की है 
 कुरेद कर भी जेहन से मैं न जिसे  निकाल सका...
तवील रात जब मुझ से तुम बावस्ता  थीं ...
 उन्हीं पलों में    मुझे फिक्र रोज़गार की थी
..उन्हीं पलों में  मुझे सय्यारों  की गर्त  छाननी थी ...
और अब लम्हे तवील हो के मेरे सर पे सय्यारों की मानीं चस्पा है
और मै उल्काओं सा तुम से टकराने को भटका फिर रहाहूँ..
..मुझे जो चूर करदे ऐसे सख्त हादसे का इंतजार है
मैं ये किस तरह का आदमी हूँ
मैं ये किस तरह का हादसा हूँ
अल्लाह तेर नाम को ,, लेकर बारम्बार
खूब कमाई रिश्वतें ..खूब भुनाए यार

काश की कोई ज़ेहन भी चमके
जिस्म यहाँ जीशान बहुत हैं 
मै एक सदा वरक अकेला
बंधने को जुज्दान बहुत हैं
वो झोंका ताजी  हवा का है नाम हम सब ने मिल कर पवन दिया है । यकीनन ये हवा आगे कई मंजिलों तक जायेगी पर यकीन जानिए जो मरासिम बावस्ता से  है वो कोई मंजिल हासिल न कर सकेगी
बावस्ता के वास्ते 

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