Saturday, August 14, 2010

कि अब दुखता बहुत है ...

...कुछ ख्वाब भींच के मुट्टी मैं
दुनिया से छुपाये रखे हैं .....


कुछ घाव मिले हैं तुम से भी
सीने मैं दबाये रखे हैं

हर रात तुम्हारे खाव्बों से

मैं नज़र बचा कर सोता हूँ

फिर नींद जहाँ लेजाती है

फसलें पानी कि बोता हूँ

हर रात तुम्हारी आहट से

ये गुस्ताखी हो जाती है

ठोकर सपनों को लगती है

और नींद वहीँ खुल जाती है

par ....मेरी

धड़कन ... बला सी

बहुत चुप है मगर
तुम ..
ये इतना जान लो कि
गिला चुकता नहीं है ...
......कि अब दुखता बहुत है ....
कि दो बजने को आये
कि दुनियां सो चुकी है
कि मेरी आखें हैं सुनी
कि नींदें खो चुकी हैं
किसे फुर्सत जो देखे
कि साँसें थम रही हैं
ki मेरे रिश्तों कि गर्मी
जो अब -तब जम रही हैं
मेरी खातिर जहा मैं
नहीं afsos कोई
कि sabki अपनी चाहत
..न चाहत मेरी कोई
main सोना ....चाहता था
मगर
अब .......
मैं darata हूँ कहीं ये
मुठ्टी खुल न जाए ...
मेरी चाहत कि दुनियां
डली सी घुल न जाए .....

ये मन chalane से pehle .....कि अब .......रुकता बहुत hai
.....ki ab दुखता bahut hai

सुमति

Friday, August 13, 2010

मुझे दरवेश* कर दे *सन्यासी

न जानू मैं किसी को न कोई मुझ को जाने ...
मेरी हस्स्ती का मतलब
tu आबे रवां * याने..... (* बहता हुआ पानी )
मेरी इल्तजा यही है
तू माने या न माने ....

मुझे दरवेश कर दे ...

तेरी दुनियां अजब है
तेरे फंदे गजब हैं
मैं फंसता जा रहा हूँ
तेरे बन्दे अजब हैं ..
मुझे मिलता नहीं है
kahin कोई ऐसा किनारा
जहाँ मैं बांध कर के अपनी
कश्ती का
saamaan सारा
.......
छोदुं इस जहाँ को
न हो किस्सा दुबारा ॥
मगर ये भी चाहता हूँ
रहें कुछ ऐसे महफूज
कि हों मेरी नज़र में
mera रैआं* बिचारा । * जवानी
.....मगर कब तक कहूँ मैं
दुआ घिस गयी है मेरी
मेरे रिश्ते चुक रहे है
हस्ती मिट रही है meri
मेरे लफ्ज खो गए हैं
मेरी जुबा फिसल रही है
मैं बोलना भी चाहूँ
तो बंदिशें कई हैं
मैंने जिस किसी को chaahaa
उसकी चाह दूसरी है
.......... में परेशां हूँ खुद से
मुझे दरवेश कर दे
मुझे दरवेश कर दे
सुना है लोग ऐसे
तेरी दुनियां में आएं
जिन्हें मिटटी मिली थी
जो तुझ से सोना पाए
मुझे सोना मिला है
मैं mitti मांगता हूँ
मेरे हिस्से कि जन्नत
मैं तुझसे बांटता हूँ
नहीं कहता मैं तुझ से
मुझे परवेज* करदे *famous
मैं तुझ से मांगता हूँ
मुझे दरवेश कर दे.......
मुझे दरवेश कर दे ................................
मुझे दरवेश कर दे

ये मेरी नज्म तमाम उन लोगों के नाम जिनेह मैंने chahaa पर वो चाह कर भी मुझे चाह न सके
...
अच्छा या बुरा
आपका
सुमति

Monday, July 19, 2010

sazayen भेज do ....

मुझे गुलज़ार साहब कि कलम से रेशम के कतरे बिखरते दिखाई देते हैं शायद post -modern era कि बात यहीं दम तोडती लगती है मुझे यकीं के साथ ये अर्ज़ करना है कि उसी प्लेटफ़ॉर्म पर वो रूहानी सी लाइने खड़ी मिलती हैं जहाँ फुल स्टॉप और कोमा के सहारे गुलज़ार साहब ग़ज़ल और नज़्म के जामे में उन्हें (लइनों को ) खड़ा कर जाते हैं कोई कैसे कह्सकता है कि पोएट्री हों नहीं सकती post modern critics को गुलज़ार समझ आयें तो शायद वे अपनी ही बात से इतिफाक न रखें । philhal गुलज़ार कि एक बेहतरीन ग़ज़ल बहुत ऊंचाई से आई है इंशा अल्लाह आप को भी पसंद आये यूँ कर ये post भेज रहा हूँ

गुलों को सुनो ज़रा तुम , सदायें भेजी हैं
गुलों के हाँथ बहुत सी , दुआएँ भेजी हैं ।

तुम्हारी खुश्क सी आँखें भली नहीं लगतीं
वो सारी चीजें जो तुमको रुलाएं भेजी हैं ।

सियाह रंग चमकती हुई किनारी है
pahin lo acchi lagengi , घटायें भेजी hain ।

tumhare khwab से har shab lipat के sote हैं
sazayen भेज do , hamne khatayen भेजी हैं ।

do lines और
meri aankhon pe tab savera हों ,
meri mutthi में jab andhera हों ।

dard, jazbat ,ashq ,tanhai
loot le aake जो lootera ho ।

sumati @ yatra



Wednesday, July 14, 2010

मेरे होने का मकसद

नज़र मैं एक ख्वाब आ के बैठ गया । सब दिखना बंद होने लगा । उम्र के साथ आपकी शक्शियत पुख्ता होने लगती है ....और जरूरतें इंसानी ।
हर उम्र का एक ख्वाब होता है
उम्र १३ .....ख्वाब सैकिल का
उम्र १६ .....पड़ोस कि लड़की
उम्र २० ......classmate girl का ख्वाब
२३...... नौकरी का
२७.... दौलत का
३२ .....तरक्की का ख्वाब ....और एक खुबसूरत मकान का ख्वाब
३५ .....अपने होने का ख्वाब .....
......ये मैं जान ता हूँ कि ये ऊपर के सब ख्वाब देख चूका हूँ ...
मेरे ख्वाब कमोवेश पूरे भी हुए हैं वो कौन सी ताक़त है जो खाव्ब पूरा करालेती है मैं नहीं जानता पर...... इतना जान ता हूँ मेरे होने के मकसद अभी तक पूरे नहीं हुए हैं ...मेरी अब इंसानी जरूरतें ....जो पूरी हो रही हैं या यूँ पकड़ो कि हो चुकी हैं
पर इंसानी मकसद .....शायद ..... यात्रा शुरू करने का ..वक़्त आ रहा है ..वो ख्वाब जो आँखों पे चिपका है ....कुछ और देखने नहीं देता ....जल्दी मिलता हूँ ....
सुमति

Tuesday, June 8, 2010

मुझे एहसास है .कि ..मैं क्या हूँ

बहुत मुश्किल में हूँ कि ये दावा कर दूँ कि .....मुझे अहसास है कि मैं क्या हूँ ...पर वो है कि ..

मेरा मजलिसी तब्बसुम ,मेरा तर्जुमा नहीं है .......

vaise to अक्स्सर ऐसे ही लोगों से मिलना होता है कि जो इस अहसास से दूर होते हैं या किसी गुमान में रहते हैं कि उन्हें ये नहीं मालुम कि ...वो क्या हैं .....कितने हैं ... कैसे हैं ... कहाँ तक हैं ...क्यूँ हैं .....और किस के हैं ...मैं जानता हूँ बहुत से ऐसे नाते रिश्ते दारों को और एक आध दोस्तों को भी ..(दोस्त एक आध ही क्यूंकि उनसे इतनी मुहब्बत करता हूँ कि उनकी इस आदत के बावजूद उन्हें छोड़ नहीं सकता और रिश्तेदार सभी क्यूँ कि उन को बदलना मेरे बस कि बात नहीं hai ) वे सब मुझे अपने में छुपे ....अपने को छुपाये .....अपनों से दूर ..अपनी ही दुनियां के ..... अपनी नज़रों में सब कुछ .....अपने ही लिए बने ... लोग लगते हैं ...

मुझे अहसास है कि '' मैं '' थोडा तुम्हारी मुस्कराहट सा दिलकश ...ज़रा सा तुम्हारी सोच तक पहुँचता हुआ .... मामूली सा तुमसे अलग ..... हल्का सा तुमको पाता हुआ ज्यादा सा तुमको खोता हुआ ............... छटांक भर जिंदगी से भरा और मन भर तुमसे खाली .... कुछ आसान से ख्वाब और बहुत कठिन सी सच्चाइयों के साथ ...कुछ हासिल -ए- तकदीर और बहुत सा कुछ नहीं .... दो चार नोट .... और बहुत कि ख्वाइश से दूर ....थोड़ी सी जमीन ढेर सा आसमान .....पत्ते हवा बूंदें ...... एक नन्हीं सी जान ...और ढेरों अरमान .....खुद को दुहराता और खुद को ही काट ता हुआ ..... मैं

तुम्हारी समझ से बहुत परे तो नहीं .... बहुत अलग भी नहीं .....कुछ दुरुस्ती कि गुन्जायिश के साथ .....

मेरे दोस्त ....

मेरा तर्जुमा तुम्ही हो

सुमति

Saturday, May 22, 2010

गयी बात 5 मई कि हो गयी..... न egipt ही गया.. न ब्लॉग पर जल्दी लौटा .....बस बचाता रहा .....कभी खुद को, कभी कारोबार को, कभी रिश्तों को कभी दोस्ती को ......कभी बैंक बैलेंस को कभी खर्चों को ....कभी phijiq को कभी उम्र को कभी नींद को कभी ख्वाब को कभी कुछ गुस्से को कभी बच्चों को कभी जिस्म को कभी रुह को ..... हाँ इधर कुछ ऐसा लगा कि ज़िन्दगी ढर्रे पे आ सकने कि गुनजाएश अभी बाकी है .कभी को यूँ लग रहा था अवल्ल मान ही लिया था कि जिंदगी कि इमारत मैं खलिश के अपने कमरे है जो पुत नहीं पाते .....पर्त दर पर्त गर्दा जमने को .बने हैं ...
॥ खपने का अपना एक अलजेब्रा है । जैसे और जब भी किसी थेओरम को solve करना होता है तो हम को पहले ही बता दिया जाता है कि रिजल्ट ये आना चाहिए या ये ही रिजल्ट होगा । आप कि मर्जी नहीं है कि किसी स्क्रीन प्ले कि तरह स्टोरी का आप एंड बदल सकें ॥ वैसा ही कुछ खपने के साथ भी लागू होता हैं ..खपने के अपने results तय हैं .. खपने कि जहाँ सारी सीमायें टूट ने लगें तो समझ लो मरने का समय आगया बस खपने से मरने के बीच का अलजेब्रा हैं हम या यूँ कहें खपने से शुरू हुई थ्योरम मरने पे जा के prove करती है कि हमारे होने का क्या मतलब था । जैसे गाँधी जी के खपने का मकसद आज़ादी या गोडसे को फांसी इनमें से एक तो था ही ।
आज बचने और खपने के बीच कि लकीर पर बैठ कर सोचता हूँ मैंने क्या खपाया और क्या बचाया
और इस थ्योरम के solve होने मैं अभी कितनी देर है । आज खुश रहने को इतना काफी है कि आज एक रिश्ते में पहले जैसी ताजगी लौट आई है .एक rishta बचा लिया है ........बस दोस्ती के रिश्ते में ही ये गुंजाईश भी होती है ..

Wednesday, May 5, 2010

कहाँ था मैं ?

कभी यूँ भी खोजते हैं हम ! और फिर खुद को ढूँढना पड़ता है लोग कहते हैं की बनावटी पन नहीं टिकता मैं महसूस कर रहा हूँ ही अपना वजूद नहीं टिकता दिखाई देरहा है ..हम खोते जा रहे है और ढोते हैं रोज़ की "to do list'' को जो खत्म नहीं होती .. नहीं हो कर देती ..अपने आप को बार बार डूबते हुए गोताखोर की तरह पानी के ऊपर लाता हूँ और कोई gravitaional force है जो नीचे खींचता है आप क्या समझते हैं की मैं ख़ुशी से अपने ब्लोग्स से इतने इतने दिन दूर रहता हूँ । नहीं । थक कर चूर करदेने वाली दौड़ ..जो न दौलत की है न शोहरत की न न परिवार की न समाजकी ...बस सुबह से शुरू to do list को ख़तम करने की है जो अगली सुबह और बड़ी होकर सामने खड़ी नज़र आती है एक नोवेल लेकर बैठ कर तो देखो कितने दिन लगते है अब ...क्या था वो दौर जब एक नोवेल खत्म दूसरा शुरू दूसरा खत्म तीसरा शुरू और हॉस्टल का अपना कमरा ...bed के दाहिने और बाएं दोनों ओर एक एक नोवेल दबा रहता था .... मैं अल्केमी नहीं जानता पर ..इतना जानता हूँ .कि ..बनावटीपन होसकता है टिक जाये आज कल अपनी original personality दब रही है ..जरा . बताना तो ये hobby या likeing का मतलब क्या होता है ?...जल्दी लौट आया तो समझना की भेडें चराना ज्याद सकून देता है बनस्पद egipt के पिरामिडों के पार जा कर खजाना ढूंढने के .....

Saturday, March 20, 2010

वोयारिज्म

वोयारिज्म एक नया शगूफा ...हम फ़िल्मी दुनिया का दिवालियापन देख रहे हैं और शायद मान रहे हैं की इस दुनियां मैं नया talent उभर रहा है ....जब की वो एक लीक पकड़ कर चल ने का आदि है या नक़ल को खूबसूरती से पेश करने का ...आज कल होड़ है mental disorders दीखाने की ...तारे ज़मी पर का दर्शील दिस्लाक्स्चिया से क्या पीड़ित हुआ सरे directors भी मेंटल disorders ढूंढने लगे ...फिर गजनी,,,फिर ....पा.....फिर ऑटिज्म खान॥
अब...... L.S.D ........... दिबाकर बनर्जी ये वोह ही शख्श है जिसने देव D मैं देवदास की ............क्या कहूँ ..जो कहना चाह रहा हूँ वो लिख नहीं सकता ... अब .L.S.D.... में वोयारिज्म पर ही पूरी फिल्म बना ली एकता कपूर जैसी नॉन सोसिअल भद्दी औरत इस की प्रोडूसर है जो सिर्फ चटकारे लेना जानती है पहले घर मैं घुस कर सास बहु के सीरियल बना कर अब ऐसी बेहूदा फिल्म .... विशाल , अनुराग कश्यप , मधुर ये सब जिनेह हम talent मान रहे है असल मैं frustration को भुना ना सीख गए है ..गाली गलौज..सेक्स ...non social relationships.... मतलब परस्ती....subjects हैं ... हम advancement मान कर ..सब देख रहे है और multiplex culture कहते है...ये सब जो वो दिखाते है हमारी कुंठाए है पर उनेह ख़त्म करने का क्या रास्ता है ....फिल्म हमारी कुंठाए बढ़ा नहीं रही हैं ?जो नहीं जानते उन को बता कर वे ऐसे लोगों को भी कुंठित कर देती हैं जो इस दुनियां से दूर हैं ..आप को याद होगा मधुर की पेज ३ के कई ऐसे सीन थे जिन से हम सभी ने नज़रे हटाली ....एक ..घिनोनी दुनिया ....जिसे वो अपने तक ही सिमित रखते तो बेहतर था ....... वे emotional अत्याचार .... और mental rape हमारा कर रहे हैं ......हम उन्हें अवार्ड दे रहे है .... प्रियंका को नेशनल अवार्ड दिया ..... देव D की पारो मैं क्या बुराई थी ....हम सब
वोयारिज्म .... से नज़र नहीं बचाते परइतना क्या जरुरी था इसे सार्वजनिक करना .....

Monday, March 1, 2010

foot fetishism

foot fetishishm पर बात पहुँचगई ...समीर को तो मैं जानता हूँ उसे पैर दो वो घुटनों तक तुरंत पहुँच जाता है मैंने अपनी लास्ट पोस्ट मैं पैरों की तारीफ मैं दो चार शब्द लिखे थे ...कुछ written मैं तो कुछ phone पर comment मिले ... britney spears, thomas Hardy, jhon gresim , jo , ....कई नाम हैं गूगेल पर देखें तो कई और नाम मिल जाएँ गे ये सभी foot lover हैं मैं अलग बात कहना चाह रहा था ...yes I. accept I AM too but ..पर मैं ने ये भी कहा था की कुछ पैरों पर लोट जाने का मन करता है ऐसे ही पैर हैं मेरे पिता के । सब से ज्यादा अपने पिता के पैरों को पसंद करता हूँ मैं बहुत बहुत भाग्य शाली मानता हूँ jo मुझे ऐसे पिता का पुत्र बनाया ..उनके पैरों को अक्सर देखता हूँ उनमें मुझे अजीब सी द्रढ़ता देखने को मिलती है jisne hum सभी को simit संसाधनों के बीच खड़ा होना सिखाया व ऐसे पाला की हम अपने जीवन मैं कुछ कर सकें । हमारे dicissions का उन्हों ने सम्मान किया और hum उनके majbut eradon से शक्ति बटोरते रहे । मेरी छोटी बेटी के पैर जब मैं अपने मुह पर रख लेता हूँ तो ऐसा लगता है की उस परमात्मा की तुलिका से अपने चेहरे को रंग रहा हूँ । मेरे भाई के पैर मुझे ऐसे लगे मनो वे मेरा अनुसरण करने को बने हैं पर कहीं वे रास्ता बदल न दें इसका थोडा सा डर है पर मैं बहुत खुश हूँ की इतने बर्षों तक वे मेरे से बंधे मेरे पीछे- पीछे आरहे हैं ॥ मेरी पत्नी के पैर मेरे पीछे पर कभी कभी मुझ से आगे निकलने की चेष्टा करते लगते हैं । मेरी मां के पैर बेहद खुबसूरत है यानी उनकी बनावट बहुत अच्छी है पर उनको लेकर मन मैं कोई भाव नहीं है ...पता नहीं क्यूँ ॥
अब बात foot fetism की ॥ ॥ शारीर का बेहद खुबसूरत भाग मैं foot की बात कर रहा हूँ nee और legs की नहीं .... आदमी पैर छोड़ सब कुछ देख डालता है कभी पैरों से किसी को पढने की कोशिश करो ..उन पर बनावटी हंसी या भाव नहीं आते वे हम को खोल कर रख देते हें. हमारे अन्दर एक तरेह का बनावटी पण है हम सब उनेह छुपाने ली कोशिश करते हें अपनी भेस भूषा अपनी language अपने हाव - भाव से बहुत कुछ छुपा भी लेजाते हें पर jo आपने किसी के भी पैरों को ढंग से देखें तो सब जान पड़ता है कुछ छुप नहीं पाता footwears से भी किसी को पहचाना जा सकता है ... मुझे अच्छे footwears पहनने वाली लडकियां बेहद पसंद हैंऔर अच्छे पैर वाली भी you may call it foot fetishm ..... अगली बार कोशिश करियेगा की पैरों से शुरुआत हो .........मुद्दा अभी खुला है आप आगे कह्सकते हैं .....

होली मुबारक

*दिगंबर खेलें *मसाने मैं होली इ भगवान शंकर , शमशान भूमि
नाग छोड़ें *गरल पिचकारी veman
ऊ साँपन की आयिएगयि टोली
दिगंबर खेलें मसाने मैं होली .
भुत पिसाचिन ने लोहू लगायो
भांग की नारद ने खायलाई गोरी,
मसाने मैं होरी ,दिगंबर खेलें
दिगंबर खेरें, मसाने मैं होरी ....

होली मुबारक सरकार ...होली मुबारक
सुमति

Tuesday, February 23, 2010

पैर

पैर इन्सान के शारीर का वो अंग जिस पर हम गौर नहीं करते ।पैरों पर झुकना ,पैर सकोड़ना , पैर फैलाना । पैरों पे गिर्जाना , पैर बचाना , पैर निकलना , पैर दिखाना , पैर पर पैर रखना और न जाने क्या क्या ....लेकिन इन पैरों की खूबसूरती पर गौर करें ...........आज जब मैं ने इस बारे में अचानक सोचना शुरू किया तो घंटों के हिसाब से बाते बिखरने लगीं हलके हलके मैंने पैर समेटना शुरू किया और वापस अपनी खोली में । मैं जिस किसी से भी मुखातिब रहा उसके पैरों पर मेरी नज़र रही । कभी पैर छुए कभी मन किया की इस शख्श के पैरों में लोटने को मिलजाए ..कभी कहीं पैर पकड़ कर बैठने का मन किय तो कहीं पैर chum lene को... तो कभी अंगूठे और उँगलियों मैं खो जाने का मन किया । मैंने कुछ खुबसूरत पैरों के छुप कर फोटो भी खींचे हैं ... bada galat laga पर क्या karun ......क्या आप भी इस में कुछ जानकारी रखते हैं तो मुझ से शेयर करियेगा । ho सकता है आपके पैर के फोटो भी मेरे पास हों ॥

Saturday, February 20, 2010

resume

पिछली पोस्ट में एक नज़्म लिखी थी पर शायद नेट की वजेह
से पूरी-पूरी ठीक उतर नहीं पाई थी .
एक बार फिर कुछ तर्तीम कर के आप के नज़र कर रहा हूँ
उम्मीद है आप मेरी request पर गौर फरमाएंगे ......


tum मुझको बस इतने से काम पे रख लो ....

की जब भी सीने मे झूलता तेरा लोकेट ...
उलट जाये ..... तो सीधा करदूं

की जब भी आवेज़ा * तेरा बालों से .. (*topes / कुंडल)
उलझ जाये.......... तो सुलझा दूँ...

की जब भी सरे राह दुपट्टा तेरा....
अटक जाये ...... तो संभाल लूँ ..


मुझ को tum बस इतने से काम पे रख लो..
दुनिया तो न जाने क्या समझती है मुझे ।


Tuesday, February 16, 2010

ek छोटा सा लम्हा है जो ख़त्म नहीं होता
मैं लाख जलाता हूँ वो भस्म नहीं होता
जिंदगी मैं कभी ऐसे मोड़ आजाते हैं की हम दूर तक उनकी टीस पाले चलते हैं ..हमारा बहुत कुछ छीन जा ता है और कुछ मिल जाता है ...एक अँधा कुआं सा है एक बंद गली सी है....खैर छोडो ..मुद्दा ये है की जल्दी अगली पोस्ट का वादा करके गया था ...और बराए मेहरबानी ...सुबह की लखनऊ की ट्रेन के जो रात भर जागना था सो पोस्ट करने बैठ्गाया ...यूँ तो कई उलाहने मेल बॉक्स तक जा पहुंचे पर क्या करें ...६ को तो आप को बताकर ही गया था की जिम कॉर्बेट जा रहा हूँ ...फिर ११ को मैनपुरी ..१६ को लखनऊ जाना है यानी आज ...१७ को बुलान्द्शेहर ..२० को गुडगाँव....यात्रा ...यात्रा बस....यात्रा ...मन कहता है की....
मुझ को इतने-से काम पे रखलो
जब भी सीने मैं झूलता लोकेट
उलट जाये ..तो सीधा करदूं ।
जब भी aaweza (kundal) uljhe baalon से
use sulajh dun मैं apne haanthon से
जो garare मैं paon phans जाये
ya atke tera dupatta kisi bala से
use sambhalu ॥
बस mujhe इतने से काम पे rakh lo ....

Thursday, February 4, 2010

दया दृष्टि

खोजती है जमी, आसमान के लिए

एक परिंदा , फलक के वीरां केलिये

ये शहर बौद्धिक नहीं माना जाता है यहाँ मध्यवर्गीय साहित्यिक लोग हैं जो तेल फुलेल लगा कर इन दिनों हर शाम I.M. A. हॉल के इर्दगिर्द दिखाई देते hain

Bareilly में जब २००७ की जनवेरी में पहली बार विजय तेंदुलकर साहब ka प्ले shakha ram book binder देखने को मिला तो एसा laga ki ये shahar भी अंगड़ाई ले रहा है है ..फिर सूरज का सातवां घोडा, घासीराम कोतवाल, और कई प्ले देखने को मिले दया दृष्टि ट्रस्ट का ये आफती शौख डॉ ब्रिजेश्वर सिंह से निकल कर पुरे ट्रस्ट पर हावी हो जाता है और जनवरी फेर्बरी में अब पूरी बरेल्लीय के sir chadh कर बोलता है मै ट्रस्ट में नहीं हूँ में तो एक दर्शक की भूमिका में प्ले देखने को डेली प्लान मैं रखता हूँ । सुबह अख़बार में पिछले दिन के प्ले के बारे में न्यूज़ पढ़कर शुरू करता हूँ और रात प्ले के गोरे काले पछ को विमर्श करते हुए ख़तम करता हूँ ...इस साल ''बाई से biscope , चेकव की दुनिया ,नमक मिर्च, ऐसा कहते हैं ,पार्क ,रूप अरूप आदि प्ले देखने को मिले अच्छा sound and light arrangment tha . makrand dshpandey yashpal sharma ,sadiya siddiqi , benjamin gilani aur ese kai chehare jine barson se t.v. per dekha hai saamne play main etne shashakt lage ki क्या कहने .....पर २००७,०८ और खास कर २००९ की तुलना मैं इस साल के प्ले दम तोड़ते नज़र आते हैं उम्मीद करते हैं की अगले साल बेहतर प्ले चुने जायेंगे .....अभी ''विजय तेंदुलकर का ''खामोश आदालत jaari है ''एक बेहतर प्ले हो सकता है ...पर उसदिन शायद मैं जिम कॉर्बेट मैं होऊं ....

कासिद kehte hain dakiye , POSTMAN ko )

kaasid ke aate aate khat ek aur lik rakhun

main jaanta hun vo jo likhenge jabav main ...

अगली पोस्ट जल्दी ही ..

Monday, January 25, 2010

sunday

दिन की शुरुआत ठीक ही रही ..दो की जगह चार अख़बार पढने को मिले times of india
ने saturday को एक स्पेशल issue निकला है ठीक है ..गुनगुनी धुप मैं मन तो यही कर रहा था की अख़बार पढ़ते पढ़ते सो जाऊं
पर हर किसी को मुक़म्मल जहाँ नहीं मिलता ..pump जाना मजबूरी है ...
.इस सिरे से उस सिरे तक सब शरीके जुर्म हैं
आदमी या तो जमानत पर रिहा है या फरार....

आप जब किसी सिस्टम मैं काम करते हैं तो एक अलग बात होती है जब लोग आपके सिस्टम
मैं काम करते हैं तो आप को लगातार जागना होता है ..कभी कभी सिस्टम की पहरेदारी करते करते
मन थक जाता है और झल्ला के जी करता है की जो हो रहा है सो होने दो ,सब छोड़ कर फुर्सत के रात दिन तलाशने निकल पड़ो
पर माया....जी हाँ माया .चैन कब लगने देती है ..माया का दूसरा अर्थ मोह भी है जो पैसे से ज्यादा खतरनाक तरीके की माया है
अपने सिस्टम का मोह ..उस पर की गयी मेहनत का मोह ..उसी मोह में अपने सिस्टम को बचाने और चलाने
के लिए हम दिन रात मरते और खपते हैं यहाँ नौकरी और व्यापार के बीच पतली किन्तु गहरी लकीर है ..एक में सिस्टम follow करना
है दुसरे में सिस्टम को follow करवाना है ..दूसरा पहले से कहीं कठिन है.. पर एक अच्छी टीम का होना दोनों ही परिस्थितियों में भाग्य पर निर्भर करता है
हाँ नियंत्रण दोनों में हो पर...
जरुरत से जियादा बंदिशें वेह्शत बढाती है
इसी वेह्शत में तो दरिया किनारे तोड़ देते हैं ..
सो सोचा pump तो जायेंगे पर टहल कर लौट आएंगे बिना किसी को डांटे फटकारे बिना किसी की कमी निकाले...इसका भी एक अलग सुख है.

Saturday, January 23, 2010


आज यका यक एक ग़ज़ल कहीं बजती सुनी मैं वहां से सेकेंड्स मैं गुज़र गया पर मेरी आँखों मैं एक दौर तैर गया 90,91 का दौर ..
............आह का वह दौर ......

मुझे दे रहे हैं तसल्लियाँ वो हर एक ताज़ा बयान से
कभी aake मंज़रे आम पे कभी hat के मंज़रे-ऐ-आम से

न गरज किसी से न वास्ता , मुझे काम अपने ही काम से ,..
तेरे ज़िक्र से ,तेरी फिक्र से ,तेरी याद से ,तेरे नाम से....

तेरी सुबह ऐसे है क्या बला, तुझे ए फलक जो हो हौसला
कभी करले आके मुकाबिला ,गम -ऐ- हिज्र -ऐ- यार की शाम से
याद है मुझे लग भग पूरी ग़ज़ल याद है
पता नहीं किसने लिख दी और कौन गा गया था एक -एक शेर जैसे स्याह मंज़र मैं रेंगती कोई दर्द की लकीर
और इर्द गिर्द इकठए कुछ यार दोस्त .......मुझे याद है हमारे बीच एक शख्श था जो इस तरह की ग़ज़ल हम लोगों को लाकर दिया करता था और हमारी उम्र भी येही कोई १९, २०
साल की........... जब दर्द से नए- नए रु-बरु हो रहे थे . उम्र का यह वो दौर होता है जब आप ऐसे ही मंज़र में जा ही फंसते हैं जहां आपके दोस्तों के अलावा कोई आपको नहीं समझता ,नहीं समझना चाहता.. बस एक धुन ...रगों मैं दौड़ते लावा की तरह ...तेरे ज़िक्र से ...तेरी फिक्र से... तेरी याद से ...तेरे नाम से
उम्र का न भुलाया जाने वाला वह दौर अज़ीम है ....

Thursday, January 14, 2010

एक मुलाक़ात

आज आप से मिलकर अच्छा लगा । कहाँ तक आप गए । पूरी एक कमिश्नरी की सदारत आप के हाँथ में रही और आज एक रूमानी ख्वाइश के इर्द गिर्द तसल्ली तलाश कर खुश ही दिखे । यूँ मैं नहीं समझ पारहा हूँ की जिस काम से आप से मिलने गया था वो हो पायेगा या नहीं पर मन एक चीज देखकर बहुत हैरान है की कैसे होता है जब एक वक़्त होता है सूरज आपके आंगन में पनाह लेता है और एक वक़्त ऐसा भी जब आप के फ्लैट मैं सूरज की शायद ही कोई किरण आती हो ॥ आप दो रह जाते हैं । और सबसे बड़ी बात बिना किसी गिला शिकवा के अपने आप में डूबे ।

बहुत छोटी जिंदगी

बहुत ज़ल्दी गुज़र जाएँ गे सारे पड़ाव

जवानी ..शोहरत ओहदा का दौर यूँ फुर्र हो जायेगा ,

इतराना इनपर कैसा

आज बहुत सोचा .... कमाना क्या है ? और गंवाना क्या ?

Wednesday, January 13, 2010

कभी टूट पड़ना
कभी टूट कर गिर पड़ना
कभी घमासान मचाते विचारों की चिल्ल पौं
और कभी कातरता से दिवार पे टंगी उस की तस्वीर से दो चार होना
मानो गुस्से ने भी अब आने से इंकार कर दिया हो और ये कह के अलग बैठ जाये की तुम्हारी परेशानी मैं भी दूर नहीं कर सकता अपने आप से जंग होते किसी ने देखी होगी वो ही इसे समझ पायेगा ...जब खुद हम अपने आप से नाराज रहते हों तो ...अपने आप से अपने लिए समय मांगते हों .. .खुद को ही टरकाते हों ॥
...........अभी हाल में एक फिल्म देखी... short cut to happiness...क्या आप एक ऐसे माहौल में रह सकते हैं जहाँ आप के achivement कुछ भी नहीं.........आप के project fail की श्रेणी मैं हों .......आप flop हों ..idealess हों ..पर लोग आप के इर्द गिर्द रहें आप के fan हों आप पर मरते हों पैसा आये शोहरत बढे popularity मिले स्टार बन जाएँ ........किन्तु आप ये जानते हों की मैं myself is a flop .... समाज को कुछ भी योगदान नहीं है मेरा ..सोचिए हैना.... भयावह condition ...वो एक hypothetical condition नहीं है । मैं ऐसे लोगों को जनता हूँ जो ... shortcut to happiness ...जैसे ही हैं। पर ग्लानी नहीं होती उन्हें ...और में पूरा होने को परेशां रहता हूँ ....धर्म से पूरा कर्म से से पूरा ..मर्म से पूरा होने को .... से लम्बी यात्रा की आपनी परेशानियाँ हैं ।
आप to बस सुन लो ...समझना चाहा तो सर दर्द हो उठेगा ...anyway goodnight

नैना ठग लेंगे

जो गम होंगे तो कुछ किस्से कहने को रह जायेंगे .
उम्र कटेगी गिरते पड़ते ,हम दरिया कहलायेंगे .
ऊपर वाला बड़ा खिलाडी ये तय है वो जीतेगा
हम हारेंगे हार के यारों फिर मंदिर को जायेंगे
ये भी कहने का दिल है की
कभी आह लब पे मचल गए ,कभी अश्क आँख से ढल गए
ये तुम्हारे गम के चराग हैं कभी बुझ गए, कभी जल गए

जो फना हुए गम-a- इश्क में ,उन्हें ज़िन्दगी का न गम हुआ
जो न अपनी आग में जल सके, वो पराई आग में जल गए


दर्द की दास्ताँ है प्यारे ..अपनी अपनी जुबान है प्यारे

दिल हूँ हूँ करे...... .घबराये ...

डुबोया मुझ को होने ने , न होता में तो क्या होता
हुई मुददत के ग़ालिब मरगया.. पर याद आता है
वो हर एक बात पे कहना कि ..यूँ होता तो क्या होता ....

कि यूँ होता तो क्या होता ॥


नैना ठग्लेंगे....

Tuesday, January 12, 2010

23 नवम्बर से काफी टाइम हो गया ,,,
कुछ थोड़े बहुत काम कर लिए
कुछ सच छुपा लिए
कुछ झूठ बोल लिए
कुछ बहाने बुनलिए
कुछ पैसे जोड़ लिए
कहीं थोड़ी बहुत देर को चलेगये
और
कहीं से उकता के भाग आए
to कहीं से घबरा के भाग आये ,
,,दिन तो कट गए ...
par बोझ नहीं घटे
,मन वैसे ही भारी ..गुम सुम ..कुछ तलाशता सा ॥
रिश्तों पर धूल की परत और मोटी हुई
वे कुछ और ज़मी दोज हुए
हम खलबलाये भी पर
कुछ लोगों का ध्यान भी शायद उधर न गया ..... खैर
बारामासी पढ़ डाली ।
अजमेर हो आए ।
पापा के लिए कार खरीद ली ।
मम्मी अब कहती हैं बेकार खरीद्ली ॥
बीबी के भाई का फ़ोन नहीं उठाया ,,
,सास ने शायद .शायद ..लखनऊ बुलाया ॥
income tax के पेपर तैयार नहीं हों पाए ॥
स्टाफ भाग गया ॥ genrator ख़राब हो गया
घर पर पुताई लगवा दी मन गन्दा हो सा रहा था ..
.ठीक ठीक पता नहीं .....
या पता ही ठीक नहीं .....सांसें चलती रही ॥
जिंदगी का क्या सोचना ॥ चली तो ठीक न चली तो ............ i quit ....